Sunday, December 21, 2014

दोहे –



दोहे – 

मयँ बासी हौं भात के, तयँ मैदा के पाव
मयँ गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव |  

मयँ सेवैया-खीर हौं, तयँ नूडल- चउमीन
मयँ बनथौं परसाद रे, तोला खावयँ छीन |

मयँ चीला देहात के, मयँ भर देथवँ पेट
तयँ तो खाली चाखना, अंडा के अमलेट |

मयँ अंगाकर मस्त हौं, तयँ पिज्जा अनमोल
अंदर बाहिर एक मयँ, तयँ पहिरे हस खोल |

अरुण  कुमार निगम

3 comments:

  1. असली नकली समझ ले, ऑखी ला झन मूँद
    सोना पीतल ला परख, लेवना ल झन खूँद ।

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  2. बिकट बढ़िया दोहा गुरुदेव

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